2025 में कांग्रेस के लिए निराशा का साल: चुनावी हार, गुटबाज़ी और नेतृत्व संकट ने बढ़ाई चुनौतियाँ

नई दिल्ली: वर्ष 2025 कांग्रेस पार्टी के लिए लगातार झटकों वाला साबित हुआ। दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों में करारी हार के साथ-साथ आंतरिक कलह, संगठनात्मक कमजोरी और वैचारिक अस्पष्टता ने पार्टी की स्थिति को और कठिन बना दिया। 2024 लोकसभा चुनाव में हासिल हुई बढ़त का लाभ उठाने में असफल रहने के बाद कांग्रेस अब एक बड़े राजनीतिक और संगठनात्मक संकट से जूझती दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी की सबसे बड़ी समस्या उसका नेतृत्व और वैचारिक भ्रम है। दिल्ली विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक देवेंद्र पै के अनुसार कांग्रेस न तो सशक्त विकल्प के रूप में सामने आ सकी और न ही किसी ठोस वैकल्पिक शासन मॉडल की तस्वीर रख पाई। उन्होंने कहा कि करिश्माई नेतृत्व और मज़बूत संगठन के अभाव ने पार्टी को कमजोर किया है।
दिल्ली चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन
दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस लगातार तीसरी बार खाता खोलने में विफल रही। हालांकि वोट शेयर में मामूली वृद्धि दर्ज हुई, लेकिन सीटों के लिहाज से पार्टी शून्य पर सिमट गई। भाजपा ने बहुमत हासिल किया जबकि आम आदमी पार्टी दूसरे स्थान पर रही। विश्लेषकों के अनुसार मतदाताओं के बीच कांग्रेस “व्यवहारिक विकल्प” के रूप में स्वीकृति नहीं जगा सकी।
बिहार में रणनीति नहीं लाई रंग
बिहार विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए एक और बड़ा झटका साबित हुए। जाति जनगणना और “वोट चोरी” जैसे मुद्दों को जोरशोर से उठाने के बावजूद पार्टी मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सकी। पार्टी का स्ट्राइक रेट दस प्रतिशत से भी कम रहा। एनडीए गठबंधन ने दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता बरकरार रखी।
विशेषज्ञों का मानना है कि कांग्रेस के आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाणों की कमी और नेतृत्व के प्रति विश्वास के अभाव ने इन मुद्दों को जनता के बीच असरहीन बना दिया।
आंतरिक कलह और नेतृत्व विवाद
2025 में पार्टी के भीतर वैचारिक मतभेद और गुटबाज़ी भी खुलकर सामने आई। शशि थरूर के बयानों पर उठे विवाद से लेकर कर्नाटक में सत्ता हस्तांतरण को लेकर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डी. के. शिवकुमार के बीच चली खींचतान ने संगठनात्मक कमजोरी को उजागर किया।
वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि शीर्ष नेतृत्व समय रहते निर्णायक हस्तक्षेप करने में विफल रहा, जिससे राजस्थान जैसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति का खतरा बढ़ा।
2026 की चुनौती
आगामी वर्ष 2026 में कई महत्वपूर्ण राज्यों – असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी – में चुनाव होने हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने वैचारिक संकट को सुलझाने, संगठन को पुनर्गठित करने और मजबूत नेतृत्व खड़ा करने की है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कांग्रेस नेतृत्व में व्यापक बदलाव और जमीनी स्तर पर पुनर्निर्माण नहीं करती, तो भाजपा शासन के खिलाफ संभावित एंटी-इन्कंबेंसी वेव का लाभ उठाना उसके लिए मुश्किल होगा।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने हालिया कांग्रेस कार्यसमिति बैठक में संगठन को मजबूत करने और एकजुटता पर बल दिया, हालांकि नेतृत्व परिवर्तन या ठोस चुनावी रणनीति पर कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की गई।
बार-बार की चुनावी हार और आंतरिक असंतोष ने कांग्रेस को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहाँ उसे अपने अस्तित्व और प्रासंगिकता दोनों के लिए गंभीर मंथन और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।



