ई20 ईंधन पर सरकार बनाम विशेषज्ञ: गडकरी के दावों से इतर पर्यावरण, पानी और खाद्य सुरक्षा पर गहराता संकट

20 प्रतिशत इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल (ई20) को लेकर सरकार और विशेषज्ञों के बीच मतभेद गहराते जा रहे हैं। लोकसभा में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने ई20 ईंधन को पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए सुरक्षित और लाभकारी बताया, वहीं विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और किसानों ने इसके दीर्घकालिक दुष्प्रभावों को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। इंजन क्षति, माइलेज में गिरावट, जल–भूमि संकट और खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बहस अब सड़क से संसद और खेतों तक पहुंच गई है।
11 दिसंबर 2025 को लोकसभा में गडकरी ने कहा कि ई20 से न केवल कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है, बल्कि इससे देश को आर्थिक लाभ भी हुआ है। उनके अनुसार, ई20 के उपयोग से अब तक करीब 736 लाख मीट्रिक टन कार्बन उत्सर्जन कम हुआ है, जिससे यह प्रभाव सैकड़ों करोड़ पेड़ लगाने के बराबर है। उन्होंने दावा किया कि अप्रैल 2014 से अब तक इथेनॉल मिश्रण से 1.40 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बची है और किसानों को 1.20 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया जा चुका है।
मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि ई20 पेट्रोल से वाहनों के इंजन को कोई नुकसान नहीं होता। ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) सहित विभिन्न संस्थानों द्वारा 1 लाख किलोमीटर तक किए गए परीक्षणों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि न तो इंजन पावर, टॉर्क और न ही ईंधन खपत में कोई बड़ा अंतर देखा गया है। गडकरी के मुताबिक 1 अप्रैल 2023 के बाद बने वाहन ई20 के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए हैं और पुराने वाहनों को न तो रिटायर करने की जरूरत है और न ही किसी बड़े संशोधन की।
हालांकि, विशेषज्ञों की राय सरकार के दावों से अलग नजर आती है। ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों के अनुसार इथेनॉल एक हाइग्रोस्कोपिक तरल है, जो हवा से नमी खींचता है। इससे ईंधन टैंक और फ्यूल सिस्टम में जंग लगने का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही, यह रबर और प्लास्टिक के हिस्सों को धीरे-धीरे कमजोर कर सकता है, खासकर 2023 से पहले बनी गाड़ियों में। वाहन निर्माता संगठन SIAM ने भी माना है कि ई20 से माइलेज में 2–4 प्रतिशत तक की गिरावट संभव है।
वहीं ऑटोमोबाइल यूट्यूबर अमित खरे और कई वाहन मालिकों ने ई20 के कारण माइलेज में ज्यादा गिरावट और इंजन समस्याओं की शिकायतें सामने आने की बात कही है। लोकलसर्कल्स के एक सर्वे में 37,000 से अधिक पेट्रोल वाहन मालिकों ने 15–20 प्रतिशत तक माइलेज घटने का अनुभव बताया है।
पर्यावरण और कृषि वैज्ञानिकों की चिंताएं इससे भी आगे जाती हैं। दिसंबर 2025 में साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, ई20 ईंधन का सबसे बड़ा पर्यावरणीय बोझ भूमि और जल संसाधनों पर पड़ता है। शोध में बताया गया है कि एक लीटर इथेनॉल उत्पादन के लिए औसतन 2,860 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। यदि भारत अपने ई20 लक्ष्य पूरे करता है, तो देश की वार्षिक सिंचाई जल मांग में करीब 50 अरब घनमीटर की अतिरिक्त वृद्धि होगी, जो दिल्ली की 17 वर्षों की पानी की जरूरत के बराबर है।
शोध में यह भी चेतावनी दी गई है कि इथेनॉल के लिए गन्ना और मक्का की खेती बढ़ने से वनों, चरागाहों और जैवविविधता को नुकसान पहुंचेगा। केवल मक्का उत्पादन के लिए लगभग 80 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि की जरूरत पड़ेगी, जिससे खाद्य फसलों पर दबाव बढ़ेगा और खाद्य महंगाई का खतरा पैदा होगा। इसके अलावा, इथेनॉल उत्पादन से मिट्टी की उर्वरता घटने और जलाशयों के अम्लीकरण जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं।
ई20 को लेकर बढ़ता टकराव तब खुलकर सामने आया, जब राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के तिब्बी क्षेत्र में निर्माणाधीन इथेनॉल संयंत्र के खिलाफ किसानों का विरोध हिंसक हो गया। 10–11 दिसंबर को सैकड़ों किसान ट्रैक्टर लेकर संयंत्र स्थल पर पहुंचे और निर्माण रोकने की मांग की। किसानों का आरोप है कि इस संयंत्र से इलाके की हवा और पानी प्रदूषित होंगे। प्रदर्शन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा, कई वाहन जला दिए गए और कांग्रेस विधायक अभिमन्यु पूनिया घायल हो गए।
राजस्थान में विपक्षी कांग्रेस ने किसानों के आंदोलन का समर्थन किया है। नेताओं का कहना है कि स्थानीय सहमति के बिना ऐसे फैसले थोपे जा रहे हैं, जिससे किसानों और पर्यावरण दोनों पर गंभीर असर पड़ेगा।
कुल मिलाकर, ई20 ईंधन को लेकर सरकार के ‘हरित ईंधन’ के दावे और विशेषज्ञों की चेतावनियों के बीच गहरी खाई नजर आ रही है। यह बहस अब केवल तकनीक और इंजन तक सीमित नहीं, बल्कि देश की जल सुरक्षा, कृषि संतुलन और खाद्य भविष्य से सीधे जुड़ती दिख रही है।



